रविवार, 1 जनवरी 2017

गुरु भक्त कल्याण


     दक्षिण-भारत की महाराष्ट्र भूमि के महाराजा शिवाजी के सद्गुरु समर्थ स्वामी रामदास जी महाराज थे। उनके अनेकों शिष्य थे। उन्हीं शिष्यों में से एक कल्याण भी थे, जो बाद में कल्याण स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं और उन्होंने परमार्थ तथा परोपकार के महान कार्य किये हैं। इन्हीं कल्याण स्वामी की अचल गुरुभक्ति के सम्बन्ध में एक कथा प्रसिद्ध है, जो इस प्रकार है।
     एक बार समर्थ स्वामी रामदास जी किसी स्थान पर विराजमान थे। कोई विशेष उत्सव था, जिसके कारण भक्तों की मण्डलियाँ दूर दूर से एकत्र होकर उनके दर्शन के लिये आई हुई थीं। समर्थ महाराज के साथ उनके सभी शिष्य-सेवक भी इस उत्सव पर इकट्ठे हुये थे। सब अपने अपने कर्तव्य के अनुसार सेवा-कार्य कर रहे थे। सेवकों में सबको सद्गुरु की सेवा बढ़-चढ़कर करने की लालसा थी। अब उनमें इस बात पर बाज़ी लग गई कि देखें कौन सबसे बढ़कर गुरु की सेवा करता है। सभी अपने आपको सबसे ऊँचे दर्ज़े का सेवक कहलवाने की इच्छा रखते थे। गुरु जी से भी यह बात छुपी हुई तो थी नहीं। उन्होंने इनकी परीक्षा करने के ख्याल से कि देखें कसौटी पर कौन सा शिष्य पूरा उतरता है, एक लीला रचाई।
     एक समय जबकि सभी सेवक उपस्थित थे, आप ज़ोर ज़ोर से कराहने लगे-इस प्रकार जैसे मानो उन्हें बहुत कष्ट हो रहा हो। यह देखकर शिष्य घबरा गये और सबने हाथ बाँधकर पूछा, भगवन्! आपको क्या कष्ट है? हमें बतायें ताकि उसका निवारण किया जाये। गुरुजी बोले, पुत्रो! मेरी टाँग में एक भारी फोड़ा निकल आया है, जिसके कारण सख्त दर्द हो रहा है। और इतना कहकर वे फिर मारे दर्द के कराह उठे।
     गुरुजी के कष्ट की बात सेवकों में बेचैनी फैल गई। सबके सब जल्दी से जल्दी इलाज का प्रबन्ध करने और गुरु जी को आराम पहुँचाने के लिये व्याकुल हो गये। कोई कुछ और कोई कुछ दवा-दारू के लिये कहने लगे। इसपर गुरु जी बोले, प्रेमियो! यह हमारा फोड़ा कोई मामूली फोड़ा नहीं है। यह तुम्हारे कहे हुये किसी बाहरी इलाज से ठीक हो सकने वाला नहीं है। तब सबने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, देव! आखिर इसका कोई न कोई इलाज तो होना ही चाहिये। वही प्रबन्ध किया जावे। समर्थ स्वामी ने उत्तर दया, हाँ, इसके लिये फकत एक ही इलाज हो सकता है और उसके करने से हमारा यह रोग तुरन्त ही मिट जावेगा, परन्तु वह उपाय अत्यन्त कठिन है।
     यह सुनकर सब सेवक बोले, महाराज! यदि वह उपाय कठिन है तो क्या?आप आज्ञा करें। जिस प्रकार भी यह कष्ट निवारण किया जा सके, हम उसी प्रकार करने में कसर हरगिज़ न छोड़ेंगे। किन्तु हमसे आपका यह कष्ट बिल्कुल नहीं देखा जाता। यदि इसे दूर करने के लिये हमारे प्राणों की आवश्यकता पड़े, तो वे भी हाज़िर कर देंगे। बस, गुरुदेव यही तो उनसे कहलवाना चाहते थे। उन्होंने उत्तर दिया, ""इस फोड़े का इलाज यह है कि तुममें से कोई एक इसका ज़हर अपने मुख से चूस ले। ऐसा करने से हमारा दर्द जाता रहेगा। लेकिन एक बात यह है कि इसका ज़हर इतना घातक है कि जो कोई इसे चूसेगा, वह तुरन्त मर जावेगा।''
     सन्तों-महापुरुषों की सब कार्यवाही सेवकों की भलाई के लिये होती है। वे सेवक की ज़ाहिरी हालत से अथवा उसके ज़बानी प्रेम जतलाने से प्रसन्न नहीं होते। वे तो उसके ह्मदय के अन्दर का सच्चा प्रेम चाहते हैं। यहाँ भी सेवकों के ह्मदय की परीक्षा थी कि कौन सेवक दिल से गुरु के साथ सच्चा प्रेम रखता है? जब गुरुजी ने यह बताया कि इस फोड़े को चूसने वाला अपने प्राणों की आहुति देगा, तो बहुत से सेवक एक दूसरा की तरफ ताकने लगे कि देखें कौन आगे बढ़ता है? कई मन में यह सोचने लगे कि यह कार्य तो अति कठिन है। यहाँ तो सचमुच ही प्राण देने पड़ेंगे, यह भला हमसे कैसे हो सकेगा? लेकिन साथ ही साथ सच्चे प्रेमी सेवक भी होते हैं, जो प्रेम की वेदी पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने से नहीं चूकते।
          कबीर भाठी  प्रेम की , बहुतक  बैठे आय।
          सिर सौंपें सो पियेंगे, और सूँ पिया न जाय।।
जहाँ कुछ कमज़ोर ख्यालों के लोग होते हैं,वहीं दृढ़ निश्चय और अटल श्रद्धा रखने वाले प्रेमी भी होते हैं। कई हिचकिचा रहे थे कि इतने में कल्याण नाम का एक सेवक आगे बढ़ा, और उसने गुरुजी के चरणों में सिर नवाकर विनती की, ""इस सेवा का सौभाग्य मुझ दीन-हीन सेवक को बख्शा जावे। यदि मेरा प्राणों के बदले मेंरा इष्टदेव भगवान का रोग दूर हो सके, तो मुझे और क्या चाहिये? ''इतना कहते हुये कल्याण की आँखों से प्रेम के आँसू टपकने लगे और उसने गुरुजी से फोड़े पर बँधी हुई मोटी सी पट्टी खोल देने के लिये निवेदन किया। गुरु जी उसका दृढ़ प्रेम देखकर और उसकी गद्गद् बाणी को सुनकर अति प्रसन्न हुये। तब उऩ्होंने कहा, ""बेटा! यदि हम पट्टी खोलते हैं, तो अति कष्ट होता है। अलबत्ता पट्टी में एक सिरे पर फोड़े का काला सा मुँह बाहर निकला हुआ है, तुम उसी से ही चूसना शुरु कर दो।''
     कल्याण ने आज्ञा सिरपर धारण कर ली और फोड़े के मुँह से अपना मुख लगा कर उसे चूसने लगा। जैसे ही उसने चूसना शुरु किया, उसे उसमें अत्यन्त मिठास मालूम हुई। अब वह जल्दी जल्दी मुख चलाने लगा। शेष सभी शिष्य-सेवक पास खड़े यह कौतुक देख रहे थे। कल्याण जल्दी करने लगा, दो गुरु जी ने उसे इस प्रकार टोका, मानों बहुत पीड़ा हो रही हो-""अरे बेटा! ज़रा धीरे धीरे चूसो, इस तरह तो तकलीफ बढ़ती है।'' मगर कल्याण को तो मिठास का आनन्द आ रहा था। थोड़ी ही देर में उसने फोड़े का सारा ज़हर चूस लिया। उसके बाद जब गुरु जी ने पट्टी अलग की, तो सब सेवक यह देखकर आश्चर्य में डूब गये कि वहाँ फोड़े की बजाये एक बड़े से तोता आम की गुठली निकली।
     असल में गुरु जी ने उन सबका मन जाँचने के लिये एक बड़े से मीठे आम को टाँग पर रखकर पट्टी पाँध ली थी। यह एक लीला मात्र थी। यह गुरुदेव का एक खेल था। कल्याण अपनी दृढ़ गुरु भक्ति के कारण इस खेल में बाज़ी मार ले गया। तथा दूसरे जो ह्मदय के कच्चे थे, प्राणों के भय से इस खेल में हार गये। कल्याण पर समर्थ स्वामी अति प्रसन्न हुये और उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे सबमें उत्तम पद प्रदान किया। जिससे वे बाद में कल्याण स्वामी के नाम से सुप्रसिद्ध हुये।

शनिवार, 31 दिसंबर 2016

सुखी होने की तरकीब


दूसरों का सुख दिखायी पड़ता है, अपना दुःख दिखायी पड़ता है।अपना सुख दिखायी नहीं पड़ता दूसरे का दुःख दिखायी नहीं पड़ता।सब दुःखी हैं अपने दुःख के कारण नहीं, दूसरे के सुख के कारण। और जब तक आपकी यह वृत्ति है तब तक आप कैसे सुखी हो सकते हैं? सुखी होने का उपाय कुछ और है। दूसरे का दुःख अगर आपको दिखायी पड़ने लगे, तो आप सुखी होना शुरु हो गये। तब आपके चारों तरफ सुख का सागर दिखायी पड़ेगा।
     एक फकीर था जून्नून।कोई भी आदमी उसके पास मिलनेआता,तो वह हँसता खिलखिला कर और नाचने लगता। लोग उससे पूछते कि बात क्या है ?वह कहता एक तरकीब मैने सीख ली है सुखी होने की। मैं हर आदमी में से वह कारण खोज लेता हूँ,जिससे मैं सुखी हो जाऊँ। एक आदमी आया, उसके पास एक आँख थी, जुन्नून नाचने लगा। यह क्या मामला है?उसने कहा कि तुमने मुझे बड़ा सुखी कर दिया,मेरे पास दोआंखें हैं,हे प्रभु इसमें तेरा धन्यवाद।एक लंगड़े आदमी को देखकर वह सड़क पर ही नाचने लगा। उसने कहा कि गज़ब अपनी कोई पात्रता न थी, दो पैर दिये हैं। एक मुर्दे की लाश को लोग मरघट ले जा रहे थे। जुन्नून ने कहा,हम अभी जिन्दा हैं,और पात्रता कोई भी नहीं है।और कोई कारण नहीं है, अगर हम मर गये होते इस आदमी की जगह तो कोई शिकायत भी करने का उपाय नहीं था। उसकी बड़ी कृपा है।
     जुन्नून दुःखी नहीं था,कभी दुःखी नहीं हो सका क्योंकि उसने दूसरे का दुःख देखना शुरु कर दिया।और जब कोई दूसरे का दुःख देखता है तो उसकी पृष्ठभूमि मेंअपना सुख दिखायी पड़ता है।और जबकोई दूसरा का सुख देखता है तो उसकी पृष्ठभूमि में अपना दुःख दिखायी पड़ता है।
प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करने का एक अन्य उपाय यह है कि मनुष्य को परमात्मा ने जो कुछ दे रखा है,सदा उसमें ही सन्तुष्ट रहे। परमात्मा का आभारी रहकर मन में यह विचार करता रहे कि अनेकों ऐसे मनुष्य भी संसार में होंगे, जिन्हे ये वस्तुयें भी उपलब्ध नहीं हैं।

शनिवार, 19 नवंबर 2016

वाह भाई बेला न वक्त न वेला



     दशमेश श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज के दरबार में एक भाई बेला आया-जाया करता था। दरबार के अनेक भक्त पढ़े-लिखे थे परन्तु यह निरक्षर था। किन्तु गुरु महाराज जी के वचनों पर इसे अटल विश्वास था। एक दिन अवसर देखकर इसने श्री गुरु महाराज जी के चरणों में प्रार्थना की कि और सिक्ख-सेवकों को गुरुवाणी पढ़ते देखकर मेरा भी मन करता है कि मैं भी पढ़ूँ। परन्तु मुझे अक्षर पढ़ना भी नहीं आता। श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि तू रोज़ साडे कोल आया कर असीं तैनूँ अखर सिखावांगे। अब बेला प्रतिदिन गुरुमहाराज जी के पास आने लगा। गुरुमहाराज जी हर रोज़ पाँच-सात अक्षर उसे पढ़ाते थे। दूसरे दिन उन्हें सुन कर और बता देते। एक दिन दरबार की सेवा करते करते भाई बेला को कुछ देर हो गई। श्री गुरुमहाराज जी बाहर जाने के लिये घोड़े पर सवार हो चुके थे। तब यह आ पहुँचा और उसने घोड़े की लगाम को पकड़ कर कहा कि मुझे अक्षर तो बताकर जाओ ताकि मैं याद करता रहूँ।
     श्री गुरुमहाराज जी ने हँसकर फरमायाः- "वाह भाई बेला! तेरा वक्त न वेला।' भाई बेले ने इतना सुनते ही लगाम छोड़ दी। श्री गुरुमहाराज जी चले गये। वह दिन बीत गया दूसरे दिन श्री गुरुमहाराज जी ने नियम के अनुसार पूछा बेला! कल तुम्हे कौन सी सन्था दी थी? भाई बेला ने हाथ जोड़कर निवेदन किया कि सच्चे पादशाह! कल आपने यह पाठ पढ़ाया था वाह भाई बेला! तेरा वक्त न वेला। श्री गुरु महाराज यह सुनकर बहुत हँसे। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा कि भाई बेला! तुम्हारा स्वभाव और हमारे वचन पर तुम्हारा विश्वास देखकर हम बहुत पुलकित हुए हैं। हम तुम्हें वर देते हैं कि तुम को सब विद्याएं अपने आप आ जाएंगी। वह अशिक्षित बेला पंडितों में सर्वश्रेष्ठ हो गया।

सोमवार, 14 नवंबर 2016

भजन-सुमिरण


    कथा है एक स्त्री बड़ी ही भगवद्भक्तऔर सन्त-सेवी थी,परन्तु उसके पति की वृत्ति हर समय माया और माया के सामान संचित करने तथा खाने-पीने आदि में ही लगी रहती थी। वह स्त्री जब भी पति से भजन-सुमिरण करने के लिये कहती,तो वह सदा हँसकर टाल देता। एक दिन जब उस स्त्री ने भजन सुमिरण के लिए पति पर बहुत ज़ोर दिया,तो वह हँसते हुए बोला, भजन-सुमिरण की अभी इतनी जल्दी क्या है? अब तो यौवन है, खाने-पीने और आनन्द लेने के दिन हैं,वृद्ध होने पर भजन-सुमिरण भी कर लिया जायेगा। क्या तुमने यह शेअर नहीं सुनाः-
         ऐश कर दुनियां में गाफिल ज़िन्दगानी फिर कहाँ।
          ज़िन्दगानी  है अगर  तो यह जवानी फिर कहाँ।।
स्त्री ने कहा-यदि ऐश करने का यही समय है तो भजन भक्ति करने का समय भी तो यही है-कहा भी हैः-
           जवानी में अदम के वास्ते सामान कर गाफिल।
           मुसाफिर जल्दी उठते हैं जो जाना दूर होता है।।
     वृद्धावस्था में तो वैसे ही शरीर के सब अंग शिथिल हो जाते हैं, उस समय तो अपनेआप को संभालना भी कठिन हो जाता है, भक्ति-भजन उस समय मनुष्य क्या करेगा? इसीलिये परमसन्त श्री कबीर साहिब जी का उपदेश हैः-
   जब लगु ज़रा रोगु नहीं आइया, जब लगु कालि ग्रसी नही काइआ।।
   जब लगु विकल भई नही बानी, भजि लेहि रे मन सारिंगपानी।।
   अब न भजसि भजसि कब भाई, आवै अंतु न भजिआ जाई।।
   जो किछु करहि सोई अब सारु, फिरि पछताहु न पावहु पार।।
          आज कहैं मैं काल्ह भजूंगा,काल्ह कहै फिर काल्ह।।
          आज  काल्ह  के करत ही, औसर जासी चाल्ह।।
यह सुनकर उसके पति ने कहा-घबराओ नहीं, मैं अभी इतनी जल्दी मरने वाला नहीं हूँ। मैं तुमसे वादा करता हूँ कि वृद्ध होने पर किसी तीर्थ-स्थान पर जाकर रहेंगे और दिन-रात प्रभु का भजन-सुमिरण करेंगे। इसके कुछ दिन बाद,एकदिन उस व्यक्ति की तबीयत एकाएक बिगड़ गई। उसे सर्दी लगकर बड़े ज़ोर का बुखार चढ़ गया। डाक्टर बुलाया गया। उसने रोगी की भलीभाँति जाँच करके कहा-मैं दवा भिजवाये देता हूँ। एक-एक घंटे बाद रोगी को दवा पिलाते रहें, शाम को मुझे फिर सूचित करें। दवा आ गई और उस स्त्री ने दवा अलमारी के ऊपर रख दी। कुछ देर बाद उस व्यक्ति ने पत्नी को आवाज़ दी और पूछा-क्या दवा आ गई है? स्त्री ने कहा-हाँ!आ गई है। ज़रा नाश्ता कर लूँ, आपको दवा पिलाती हूँ। यह कहकर वह रसोईघर में चली गई। जब वह काफी देर तक न आई, तो उस व्यक्ति न पुनः उसे बुलाकर कहा-तुमने अभी तक दवा नहीं पिलाई। स्त्री ने कहा-अभी पिलाती हूँ। यह कहकर वह फिर वहाँ से चली गई।उस व्यक्ति ने सोचा-दवाई पिलाने के लिये गिलास आदि लेने गई होगी,अभी आ जाएगी। किन्तु जब काफी समय तक वह वापस न आई,तो उसने फिर उसे आवाज़ दी। उसके आजाने पर उस व्यक्ति ने कहा-क्या दवा नही पिलाओगी?स्त्री ने कहा-दवा तो रखी ही है,अभी पिलाती हूँ। इतनी जल्दी क्यों कर रहै हैं? वह व्यक्ति क्रोध में बोला- मैं बुखार से मर रहा हूँ और तुम कहती हो इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो? क्या मेरे मरने के बाद दवा पिलाओगी?
    स्त्री ने हँसकर कहा-मैं जब भी भजन-सुमिरण के लिए कहती हूँ तो आप सदैव यही उत्तर देते हैं किअभी जल्दी क्या है,मैं इतनी जल्दी मरने वाला नहीं हूँ,फिर आज दवा के लिये आप जल्दी क्यों कर रहै हैं? मैंने तो आपकी इस बात पर,""कि मैं अभी इतनी जल्दी मरने वाला नहीं हूँ'' दृढ़ विश्वास करके यही सोचा कि घर का कामकाज निपटा कर फुर्सत से आपको दवा पिलाऊँगी। किन्तु आज आप ये मरने की बातें क्यों कर रहै हैं? अभी तो आपने बहुत दिन जीना है। फिर आपने मुझसे यह वादा भी कर रखा है कि वृद्धावस्था में तीर्थ-स्थान पर जाकर भजन-सुमिरण करेंगे। क्या आप अपना वह वादा भूल गये?बात उस व्यक्ति की समझ में आ गई। उसने वादा किया कि अब वह भजन-सुमिरण के कार्य में कभी भी टालमटोल नहीं करेगा।डाक्टर की औषधि से वह कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो गया और अपना अधिकतर समय भजन-सुमिरण में व्यतीत करने लगा।
   कथा काअभिप्राय यह कि मनुष्य को भजनभक्ति के कार्य में बिल्कुल टालमटोल नहीं करना चाहिये। आम मनुष्य अज्ञान वश भजन भक्ति के वास्तविक कार्य में तो टालमटोल करता है और माया तथा माया के सामान एकत्र करने में दिन-रात व्यस्त रहता है। उसे यह विचार करना चाहिए कि क्या माया तथा माया के सामान आज  तक  किसी के साथगये हैं? यदि नहीं तो फिर इनकी प्राप्ति के यत्न में लगकर अपने दुर्लभ जीवन को नष्ट कर देना कहां की बुद्धिमत्ता है? साथ तो केवल भजन-भक्ति और नाम की कमाई ही जाती है। यह कमाई ही परमात्मा के दरबार में जीव का मुख उज्जवल करती है और उसे आवागमन के चक्र से छुड़ाती है। अतः मनुष्य का कर्तव्य है कि भजन-भक्ति और नाम की कमाई करके मनुष्य जीवन के स्वर्णिमअवसर का पूरा पूरा सदुपयोग करेऔर अपने उद्देश्य की पूर्ति करअपना जन्म सफल एवं सकारथ करे। अपना परलोक भी संवार ले और संसार में भी अपना नाम रोशन करे।

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

ठगों ने ब्रााहृण से बकरी ठगी


कोई आदमी भक्ति की तरफ जाये तो कहते हैं कि क्या पागलपन कर रहे हो?ज़िन्दगी छोड़कर कहां भागे चले जा रहे हो?लेकिन ऐसा हो जाता है अगर बहुत लोग यही कहें तो बेचारा जो जा रहा है प्रभु की तरफ, वह भी सोचने लगता है कि पता नहीं क्योंकि जब सारे लोग कह रहे हैं, हज़ारों लोग यही कह रहे हैं तो यही ठीक कहते होंगे।
    एक ब्रााहृण एक गांव से एक बकरी खरीदकर वापिस लौट रहा है। बड़ी प्रसिद्ध है कहानी,लेकिन आधी सुनी होगी।मैं पूरी ही सुनाना चाहता हूँवह बकरी को रखकर कंधे पर वापिस लौट रहा है।सांझ हो गयी है,दो चार ठगों ने उसे देखा है।उन्होंने कहा,अरे!यह बकरी तो बड़ी स्वादिष्ट मालूम पड़ती है।इस नासमझ ब्रााहृण के साथ जा रही है,इसको मजा भी क्या आयेगा,ब्रााहृण को भी क्या,बकरी को भी क्या। इस बकरी को छीन लेना चाहिए। एक ठग नेआकर उसके सामने उस ब्रााहृण से कहा,पंडित  जी नमस्कार। बड़ा अच्छा कुत्ता खरीद लाये। उसने कहा, कुत्ता। बकरी है महाशय। आँखें कमज़ोर हैं आपकी?उसने कहा, बकरी कहते हैं इसे आप?आश्चर्य है। हम भी बकरी को जानते हैं। लेकिन आपकी मर्ज़ी, अपनीअपनी मर्ज़ी कोई कुत्ते को बकरी कहना चाहे तो कहे। वहआदमी चल पड़ा। उस ब्रााहृण ने सोचा,अज़ीब पागल हैं इस गांव के।बकरी को कुत्ता कहते हैं?लेकिन फिर भी एक दफे टटोल कर देखा शक तो थोड़ा आया ही। लेकिन उसने पाया कि बकरी है। बिलकुल फिज़ूल  की बात है। अभी दस कदम आगे बढ़ा था। शक मिटाकर किसी तरह आश्वस्त हुआ था कि दूसरा उनका साथी मिला। उसने कहा,नमस्कार पंड़ित जी। लेकिनआश्चर्य,ब्रााहृण होकर कुत्ता सिरपर रखें।जाति से बाहर होना है? उसने कहा,कुत्ता।लेकिनअब वह उतनी हिम्मत से न कह सका कि यह बकरी है। हिम्मत कमज़ोर पड़ गयी।उसने कहा,आपको कुत्ता दिखायी पड़ता है?उसने कहा,दिखायी पड़ता है? है। नीचे उतारिए, गांव का कोई आदमी देख लेगा पड़ोस का तो मुश्किल में पड़ जायेंगे।वह आदमी गया तो उस ब्रााहृण ने उस बकरी को नीचे उतारकर गौर से देखा वह बिल्कुल बकरी थी। यह तो बिल्कुल बकरी है,लेकिन दो-दो आदमी भूल कर जाये,यह ज़रा मुश्किल है फिर भी सोचा, मज़ाक भी कर सकते हैं। चला फिर कंधे पर रखकर,लेकिन अब वह डरकर चल रहा है,अब वह ज़रा अंधेरे में से बचकर निकल रहा है। अब वह गलियों में से चलने लगा है, अब वह रास्ते पर नहीं चल रहा है। तीसरा आदमी उसे एक गली के किनारे पर मिला। उसने कहा,पंडित जी हद्द कर दी। कुत्ता कहां मिल गया?कुत्ते की तलाश मुझे भी है। कहां से ले आये हैं यह कुत्ता, ऐसा मैं भी चाहता हूँ। तब तो वह यह भी न कह सका कि क्या कह रहे हैं। उसने कहा कि जी हां, खरीद कर ला रहा हूँ। वह आदमी गया कि फिर उसने उतारकर भी नहीं देखा,उसे छोड़ा एक कौने में और भागा। उसने ने कहा कि अब इससे भाग ही जाना उचित है। झंझट हो जायेगी, गांव के लोग देख लेंगे। पैसे तो मुफ्त गये ही गये, जाति और चली जायेगी।यह जो तीन आदमी कह गये हैं एक बात को तो बड़ी सच
मालूम पड़ने लगती है।(ठग-मन मायाऔर काल)यह तोआधी कहानी है।
दूसरा जन्म में ब्रााहृण फिर बकरी लेकर चलता था। बकरी लेकर लौट रहा है लेकिन पिछले जन्म की याद है। वह जिसको याद रह जाये उसी को तो ब्रााहृण कहना चाहिए,बकरी लेकर लौट रहा है, वही ठग।असल में हम भूल जाते हैं इसलिए ख्याल नहीं रहता है,कि वही वही बार बार हमको कई बार मिलते हैं,कई जन्म में वही लोग बारबार मिल जाते हैं। वही तीन ठग उन्होंने देखा अरे। ब्रााहृण बकरी को लिए चला जा रहा है। छीन लो,उन्हें कुछ पता नहीं है कि पहले भी छीन चुके हैं। किसको पता है?अगर हमें पता हो कि हम पहले भी यही कर चुके हैं तो शायद फिर दुबारा करना मुश्किल हो जाये।फिर उन्होंने षडयंत्र रच लिया है। फिर एक ठग उसे रास्ते पर मिला है। उसने कहा,नमस्कार पंडित जी। बड़ा अच्छा कुत्ता कहां ले जा रहे हैं?पंडित जी ने कहा, कुत्ता सच में बड़ाअच्छा है। उसने गौर से देखा,ठग ने सोचा,हमको तो बकरी दिखायी पड़ती थी, हम तो धोखा देने के लिए कुत्ता कहते थे। और उस पंडित ने कहा, कुत्ता सच में बड़ा अच्छा है,बड़ी मुश्किल से मिला, बहुत मांगकर लाया,बड़ी मेहनत की,खुशामद की किसी आदमी की,तब मिला।उस ठग ने बहुत गौर से फिर से देखा कि मामला क्या है,भूल हो गयी है?लेकिन उसने कहा, नहीं पंडित जी,कुत्ता ही है न।उसने कहा,कैसी बात कर रहे हैं आप,कुत्ता ही है।अब वह ठग मुश्किल में पड़ गया है,वह यह भीनहीं कह सकता कि बकरी है, क्योंकि खुद उसने कुत्ता कहा था। दूसरे कौने पर दूसरा ठग मिला। उसने कहा कि धन्य हैं। धन्य महाराज,आप कुत्ता सिर पर लिए हुए हैं? ब्रााहृण ने कहा, कुत्ते से मुझे बड़ा प्रेम है।आपको पसंद नहीं आया कुत्ता?उस आदमी ने गौर से देखा, उसने कहा कुत्ता।
तीसरे चौरस्ते पर मिला है तीसरा आदमी, लेकिन उन दोनों ने उसको खबर दे दी कि मालूम होता है, हम ही गलती में हैं। हमें बकरी दिखायी पड़ रही है। उस तीसरे आदमी ने गौर से देखा।और उस पंडित ने कहा, क्या देख रहे हैं गौर से?उसने कहा,कुछ नहीं,आपका कुत्ता देख रहा हूँ। काफी अच्छा है।

शनिवार, 5 नवंबर 2016

वापिस अपना भिक्षापात्र लेने जाने लगा

वापिस अपना भिक्षापात्र लेने जाने लगा
एक सूफी फकीर के पास एक खोजी आया। लेकिन खोजी देखकर दंग हुआ कि सूफी फकीर तो बड़ी शान से रहता था। उसने तो सुना था कि फकीरों को तो दीनता और दरिद्रता में रहना चाहिए। फकीर का अर्थ ही होता है कि जो गरीब है। यह कैसा फकीर। सोने का सिंहासन था उस फकीर का। राजमहल था उसका आश्रम। सब तरह की सुख-सविधाएं थीं। हीरे-जवाहरात बरसे पड़ते थे। सम्राट उसके शिष्य थे। उस फकीर से बड़ी बेचैनी होने लगी। यह तो बिल्कुल उलटा ही हो रहा है।
     लेकिन उस सूफी ने कहा कि अब आ ही गए हो,माना कि तुम्हारा मन राज़ी नहीं हो रहा है, कुछ देर तो मेहमान रहो,फिर जाना है तो चले जाना।थोड़ा और करीब से देखो।देखा करीब से,लेकिन कुछ दिखाई नहीं पड़ा कि इसमें योग कहां है?भोग तो खूब चल रहा था,योग कहां हैं,वह दिखाई नहीं पड़ता था। फिर उसे यह भी डर लगा कि अगर यहां ज्यादा देर रुका तो यहीं गति मेरी हो जाएगी।क्योंकि उसे भी धीरे-धीरे रसआने लगा। अच्छा भोजन मिला।अभी तो रूखा-सूखा खाता था।अच्छा भोजन मिला,स्वाद लगा। अच्छे बिस्तर पर सोने को मिला, तो डर लगने लगा कि अब वृक्षों के नीचे सो सकूँगा या नहीं,नींद आएगी भी कि नहीं? उस सूफी ने दो आदमी लगा रखे थे जो रोज़ सुबह उसका हाथ-पैर दाबते, मालिश करते। उसने कहा,यह मसीबत हुई जा रही है अब बिना मालिश के चैन न पड़ेगी। कौन मेरी मालिश करेगा?वह घबड़ा गया। आठ-पंद्रह दिन बाद उसने कहा, मुझे आज्ञा दें, मैं जाना चाहता हूँं। सूफी ने कहा, घबड़ा गए। डर गए।कला नहीं आती?कहां जाना चाहते हो?उसने कहा मैं तो जंगल में जा रहा हूँ।उस सूफी ने कहा,तो मैं भी चलता हूँ। खोजी तो मान नहीं सका कि यह सूफी कैसे जाएगा। इतना बड़ा महल, इतनी व्यवस्था सब छोड़कर। मगर वह चल पड़ा उसके साथ। जब कुछ मील दोनों निकल गए, तब उस खोजी को याद आया कि मैं अपना भिक्षापात्र आपके महल में भूल आया,तो मैं जाकर उसे वापिस ले आऊँ? तो उसे सूफी ने कहा,अपने साथ न चलेगा। मैं अपना पूरा महल छोड़ आया, तू भिक्षापात्र भी नहीं छोड़ सकता। फिर नमस्कार! फिर हमारे रास्ते अलग हो गए। फिर हमारी दोस्ती न चलेगी।
     वह सूफी फकीर उसे यह स्मरण दिला रहा था कि सवाल क्या पकड़ा है यह नहीं है,सवाल तो पकड़ने का है।लंगोटी कोई पकड़ सकता है, भिक्षापात्र कोई पकड़ सकता है, कोई महल ही थोड़े ही चाहिए बंधने के लिए। कुछ भी हो तो बँध सकता है। अगर कला न आती हो। और कला आती हो तो फिर महल में भी रहकर भी कोई आवश्यक नहीं है कि बँधे। फिर जल में कमलवत हो सकता है।

सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

घर के नौकर मालिक बने


गुरजिएफ कहा करता था कि मैने एक ऐसे घर के सम्बन्ध में सुना है जिसका मालिक कहीं दूर यात्रा पर गया था। बहुत बड़ा भवन था, बहुत नौकर थे। वर्षों बीत गए,मालिक की खबर नहीं मिली।मालिक लौटा भी नहीं,सन्देश भी नहींआया।धीरे-धीरे नौकर यह भूल गए कि कोई मालिक था भी कभी। भूलना भी चाहते हैं नौकर कि कोई मालिक है तो जल्दी भूल गए। फिर कभी कोई यात्री उस महल के बाहर से निकलताऔर कोई नौकर सामने मिल जाता तो वह उससे पूछता कौन है इस भवन का मालिक?नौकर कहता,मैं हूँ इसका मालिक।लेकिन आसपास के लोग बड़ी मुश्किल में पड़े क्योंकि कभी द्वार पर कोई मिलता,कभी द्वार पर कोई और बहुत नौकर थे और हरेक कहता कि मालिक मैं हूँ।
     सारे लोग चिंतित हुए कि कितने मालिक हैं इस भवन के।तब एक दिन सारे गांव के लोग इकट्ठे हुए और उन्होने पता लगाया।सारे घर के नौकर इकट्ठे किए, तो मालूम हूआ वहां कई मालिक थे। अब बड़ी कठिनाई खड़ी हो गई। सब नौकर लड़ने लगे। उन्होने कहा,मालिक हम हैं और जब बात बहुत बढ़ गई तब उसी एक बूढ़े नौकर ने कहा, क्षमा करें, हम व्यर्थ विवाद में पड़े हैं। मालिक घर के बाहर गया है। हम सब नौकर हैं। मालिक लौटा नहीं, बहुत दिन हो गए,हम भूल गए। और अब कोई ज़रूरत भी नहीं रही याद रखने की। शायद वह कभी लौटेगा भी नहीं।फिर मालिक तत्काल विदा हो गए यानी वे तत्काल नौकर हो गये। गुरजिएफ कहा करता था, यह आदमी के चित्त की कहानी है।
     जब तक भीतर की आत्मा जागती नहीं तब तक चित्त का एक-एक टुकड़ा एक-एक नौकर कहता है, मैं हूँ मालिक। जब क्रोध करने वाला टुकड़ा सामने होता है तो वह कहता है, मैं हूँ मालिक।ओर वह मालिक बन जाता है है कुछ देर के लिए, और पूरा शरीर उसके पीछे चलता है। इसी तरह अन्य विकार। मालिक बने हुए हैं। असली मालिक का पता ही नहीं। जब तक असली मालिक न आ जाये तब तक अराजकता रहेगी। इसी तरह मन कई खण्डों में बंटा है जब तक मन सब तरफ से एकत्र नहीं होता एक नही होता सुख प्राप्त नहीं हो सकता।