बुधवार, 5 अक्तूबर 2016

इस गाँव के लोग कैसे हैं


     एक छोटे से गांव में सुबह ही सुबह एक बैलगाड़ी आकर रूकी। और उस बैलगाड़ी के मालिक ने उस गांव के दरवाज़े पर बैठे हुए एक बूढ़े आदमी से पूछा, ऐ बूढ़े। इस गांव के लोग कैसे हैं?मैं इस गांव में स्थायी रूप से निवास करना चाहता हूँ। क्या तुम बता सकोगे, गांव के लोग कैसे हैं?उस बूढ़े ने उस गाड़ी वाले को नीचे से ऊपर तक देखा। उसकी आवाज़ को ख्याल किया, उसने आते ही कहा, ऐ बूढ़े। वृद्धजनों से यह बोलने का कैसा ढंग है?फिर उस बूढ़े ने उससे पूछा कि मेरे बेटे, इसके पहले कि मैं तुझेबताऊँ कि इस गांव के लोग कैसे हैं मैं यह जानलेना चाहूँगा कि उस गांव के लोग कैसे थे,जिसे तू छोड़कर आ रहा है। क्योंकि उस गांव के लोगों के सम्बन्ध में जब तक मुझे पता न चल जाए तब तक इस गांव के सम्बन्ध में कुछ भी कहना संभव नहीं है। उस आदमी ने कहा,उस गांव के लोगों की याद भी मत दिलाओ, मेरी आंखों में खून उतर आता है। उस गांव जैसे दुष्ट,उस गांव जैसे पापी, उस गांव जैसे बुरे लोग ज़मीन पर कहीं भी नहीं है। उन दुष्टों के कारण ही तो मुझे वह गांव छोड़ना पड़ा है।और किसी दिन अगर मैं ताकत इकट्ठी कर सका तो उस गांव के लोगों को मज़ा चखाऊँगा। उस गांव के लोगों की बात ही मत छेड़ो। उस बूढ़े ने कहा,मेरे बेटे,तू अपनी बैलगाड़ी आगे बढ़ा। मैं सत्तर साल से इस गांव में रहता हूं, मैं तुझे विश्वास दिलाता हूं, इस गांव के लोग उस गांव के लोगों से भी बुरे हैं। मैं अनुभव से कहता हूँ। इस गांव से बूरे जैसे आदमी तो कहीं भी नहीं हैं अगर तू यहाँ रहेगा तो पायेगा कि उस गांव के लोग से यह गांव और भी बदतर है। तू कोई गांव खोज ले। जब उसने बैलगाड़ी बढ़ा ली तो उस बूढ़े ने कहा,और मैं जाते वक्त तुझसे यह भी कहे देता हूं कि इस पृथ्वी पर कोई भी गांव तुझे नहीं मिल सकता,जिस गांव में उस गांव से बुरे लोग न हों। लेकिन वह आदमी तो जा चुका था।
    वह गया भी नहीं था कि एक घुड़सवार आकर रूक गया और पूछा कि इस गांव के लोग कैसे हैं?मैं भी इस गांव में ठहर जाना चाहता हूँ। उस बूढ़े ने कहा,बड़ेआश्चर्य की बात हैअभी अभी एक आदमी यही पूछ कर गया है। लेकिन में तुमसे भी पूछना चाहूँगा कि उस गांव के लोग कैसे थे,जहां से तुम छोड़कर आये हो। उस घुड़सवार की आँखों में कोई जैसे रोशनी आ गई,उसके प्राणों में जैसे कोई गीत दौड़ गया। जैसे किसी सुगन्ध से उसकी श्वासें भर गयीं और उसने कहा,उस गांव के लोगों की याद भी मुझे खुशी की आँसुओं से भर देती है, इतने प्यारे लोग हैं। पता नहीं,किस दुर्भाग्य के कारण मुझे वह गांव छोड़ना पड़ा।अगर कभी सुख के दिन वापिस लौटेंगे तो मैं वापिस लौट जाऊँगा उसी गांव में,वही गांव मेरी कब्रा बने, यही मेरी कामना रहेगी। उस गांव के लोग बड़े भले हैं। इस गांव के लोग कैसे हैं?उस बूढ़े ने उस जवान आदमी को घोड़े से हाथ पकड़कर नीचे उतार लिया,उसे गले लगा लिया और कहा,आओ, हम तुम्हारा स्वागत करते हैं।इस गांव के लोगों को मैं भलीभांति जानता हूँ सत्तर साल से जानता हूँ इस गांव के लोगों को तुम उस गांव के लोगों से बहुत भला पाओगे। ऐसे भले लोग कहीं भी नहीं हैं।
     आदमी जैसा होता है,पूरा गांव वैसा ही उसे दिखायी पड़ता है आदमी जैसा होता है,पूरा जीवन उसे वैसा ही प्रतीत होता है।आदमी जैसा होता है संसार उसे वैसा ही मालूम होने लगता है। जो लोग भीतर दुःख से भरे हैं और जिनकी जीवन दृष्टिअन्धेरी है वे लोग कहते हैं कि जीवन दुःख है जीवन अन्धकार है।उनका जीवन दुख रूप हो जाता है। आनन्द के भाव से जीवनऔर जीवन के स्वस्थअनुभव,जीवन का सौंदर्य और जीवन का सत्य और जीवन का शिवत्व उपलब्ध होता है इसलिए अगर जीवन को धार्मिक बनाना है तो दुःख के भाव को छोड़ देना होगा और आनन्द के भाव को जगह देनी होगी।दुःख का भाव क्या है और आनन्द का भाव क्या है?किस भाँति हमारे मन में दुःख के भाव को धीरे धीरे बिठाया जाये। और किस भांति हमारे मन में आनन्द का भाव तिरोभूत हो जाये। यह समझ लेना ज़रूरी है।एक दुःखी व्यक्ति देखता है, हज़ारों कांटों की गिनती कर लेता है और तब कहता है कितने कांटे इतने कांटे, कि एक फूल की कीमत नहीं कोई। एक फूल हो या न हो, बराबर है। लेकिन आनन्द के भाव से देखने वाले को दिखाई पड़ता है कितनी अद्भुत है यह दुनियाँ जहां इतने कांटे हैं वहां एक फूल भी पैदा होता है।और जब कांटों में फूल पैदा हो सकता है तो कांटे हमारे देखने के भ्रम होंगे क्योंकि जिन कांटों के बीच फूल पैदा हो जाता है। वे कांटे भी फूल सिद्ध हो सकते हैं।जो कांटों की गिनती करता है उसके लिए फूल भी कांटा दिखायी पड़ने लगता है और जो फूल के आनन्द को अनुभव करता है उसके लिए धीरे धीरे कांटे भी फूल बन जाते हैं। एक दुःखी और निराश और उदास चित्त से अगर हम पूछें कि कैसी दुनियां तुमने पायी,वह कहेगा,बहुत बुरी है यह दुनियाँ दो अन्धेरी रातें होती हैं तब कहीं मुश्किल से एक छोटा सा दिन होता है।एकआनन्द के भाव में डूबे आदमी से हम पूछें कि कैसी पायी तुमने दुनियां?वह कहेगा बड़ी अदभुत है दो उजाले से भरे दिन होते हैं,तब बीच में एक छोटी सी अन्धेरी रात होती है।रातें भी हैं दिन भी हैं।कांटे भी हैं फूल भी हैं। लेकिन हम क्या देखते हैं,हमारी दृष्टि क्या है इसपर पूरी की पूरी जीवन की दिशा और जीवन का आयाम निर्धारित होगा।औरआश्चर्य तो यह है कि हम जो देखना शुरू करते हैं,धीरे धीरे उसके विपरीत जो था उसी में परिवर्तित होता चला जाता है।वह भी उसीमें परिवर्तित होता चला जाता है। कांटे फूल बन सकते हैं। फूल कांटे बन सकते हैं।हमारी दृष्टि पर निर्भर है कि हम किस भाँति देखना शुरु करते हैं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ कहाँ से चले थे कहाँ आ गये हैं - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  2. सही बात है . मेरी नानी अक्सर कहती थी कि जग कैसा कि मेरे जैसा ..

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  3. सही बात है . मेरी नानी अक्सर कहती थी कि जग कैसा कि मेरे जैसा ..

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