रविवार, 1 जनवरी 2017

गुरु भक्त कल्याण


     दक्षिण-भारत की महाराष्ट्र भूमि के महाराजा शिवाजी के सद्गुरु समर्थ स्वामी रामदास जी महाराज थे। उनके अनेकों शिष्य थे। उन्हीं शिष्यों में से एक कल्याण भी थे, जो बाद में कल्याण स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं और उन्होंने परमार्थ तथा परोपकार के महान कार्य किये हैं। इन्हीं कल्याण स्वामी की अचल गुरुभक्ति के सम्बन्ध में एक कथा प्रसिद्ध है, जो इस प्रकार है।
     एक बार समर्थ स्वामी रामदास जी किसी स्थान पर विराजमान थे। कोई विशेष उत्सव था, जिसके कारण भक्तों की मण्डलियाँ दूर दूर से एकत्र होकर उनके दर्शन के लिये आई हुई थीं। समर्थ महाराज के साथ उनके सभी शिष्य-सेवक भी इस उत्सव पर इकट्ठे हुये थे। सब अपने अपने कर्तव्य के अनुसार सेवा-कार्य कर रहे थे। सेवकों में सबको सद्गुरु की सेवा बढ़-चढ़कर करने की लालसा थी। अब उनमें इस बात पर बाज़ी लग गई कि देखें कौन सबसे बढ़कर गुरु की सेवा करता है। सभी अपने आपको सबसे ऊँचे दर्ज़े का सेवक कहलवाने की इच्छा रखते थे। गुरु जी से भी यह बात छुपी हुई तो थी नहीं। उन्होंने इनकी परीक्षा करने के ख्याल से कि देखें कसौटी पर कौन सा शिष्य पूरा उतरता है, एक लीला रचाई।
     एक समय जबकि सभी सेवक उपस्थित थे, आप ज़ोर ज़ोर से कराहने लगे-इस प्रकार जैसे मानो उन्हें बहुत कष्ट हो रहा हो। यह देखकर शिष्य घबरा गये और सबने हाथ बाँधकर पूछा, भगवन्! आपको क्या कष्ट है? हमें बतायें ताकि उसका निवारण किया जाये। गुरुजी बोले, पुत्रो! मेरी टाँग में एक भारी फोड़ा निकल आया है, जिसके कारण सख्त दर्द हो रहा है। और इतना कहकर वे फिर मारे दर्द के कराह उठे।
     गुरुजी के कष्ट की बात सेवकों में बेचैनी फैल गई। सबके सब जल्दी से जल्दी इलाज का प्रबन्ध करने और गुरु जी को आराम पहुँचाने के लिये व्याकुल हो गये। कोई कुछ और कोई कुछ दवा-दारू के लिये कहने लगे। इसपर गुरु जी बोले, प्रेमियो! यह हमारा फोड़ा कोई मामूली फोड़ा नहीं है। यह तुम्हारे कहे हुये किसी बाहरी इलाज से ठीक हो सकने वाला नहीं है। तब सबने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, देव! आखिर इसका कोई न कोई इलाज तो होना ही चाहिये। वही प्रबन्ध किया जावे। समर्थ स्वामी ने उत्तर दया, हाँ, इसके लिये फकत एक ही इलाज हो सकता है और उसके करने से हमारा यह रोग तुरन्त ही मिट जावेगा, परन्तु वह उपाय अत्यन्त कठिन है।
     यह सुनकर सब सेवक बोले, महाराज! यदि वह उपाय कठिन है तो क्या?आप आज्ञा करें। जिस प्रकार भी यह कष्ट निवारण किया जा सके, हम उसी प्रकार करने में कसर हरगिज़ न छोड़ेंगे। किन्तु हमसे आपका यह कष्ट बिल्कुल नहीं देखा जाता। यदि इसे दूर करने के लिये हमारे प्राणों की आवश्यकता पड़े, तो वे भी हाज़िर कर देंगे। बस, गुरुदेव यही तो उनसे कहलवाना चाहते थे। उन्होंने उत्तर दिया, ""इस फोड़े का इलाज यह है कि तुममें से कोई एक इसका ज़हर अपने मुख से चूस ले। ऐसा करने से हमारा दर्द जाता रहेगा। लेकिन एक बात यह है कि इसका ज़हर इतना घातक है कि जो कोई इसे चूसेगा, वह तुरन्त मर जावेगा।''
     सन्तों-महापुरुषों की सब कार्यवाही सेवकों की भलाई के लिये होती है। वे सेवक की ज़ाहिरी हालत से अथवा उसके ज़बानी प्रेम जतलाने से प्रसन्न नहीं होते। वे तो उसके ह्मदय के अन्दर का सच्चा प्रेम चाहते हैं। यहाँ भी सेवकों के ह्मदय की परीक्षा थी कि कौन सेवक दिल से गुरु के साथ सच्चा प्रेम रखता है? जब गुरुजी ने यह बताया कि इस फोड़े को चूसने वाला अपने प्राणों की आहुति देगा, तो बहुत से सेवक एक दूसरा की तरफ ताकने लगे कि देखें कौन आगे बढ़ता है? कई मन में यह सोचने लगे कि यह कार्य तो अति कठिन है। यहाँ तो सचमुच ही प्राण देने पड़ेंगे, यह भला हमसे कैसे हो सकेगा? लेकिन साथ ही साथ सच्चे प्रेमी सेवक भी होते हैं, जो प्रेम की वेदी पर अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने से नहीं चूकते।
          कबीर भाठी  प्रेम की , बहुतक  बैठे आय।
          सिर सौंपें सो पियेंगे, और सूँ पिया न जाय।।
जहाँ कुछ कमज़ोर ख्यालों के लोग होते हैं,वहीं दृढ़ निश्चय और अटल श्रद्धा रखने वाले प्रेमी भी होते हैं। कई हिचकिचा रहे थे कि इतने में कल्याण नाम का एक सेवक आगे बढ़ा, और उसने गुरुजी के चरणों में सिर नवाकर विनती की, ""इस सेवा का सौभाग्य मुझ दीन-हीन सेवक को बख्शा जावे। यदि मेरा प्राणों के बदले मेंरा इष्टदेव भगवान का रोग दूर हो सके, तो मुझे और क्या चाहिये? ''इतना कहते हुये कल्याण की आँखों से प्रेम के आँसू टपकने लगे और उसने गुरुजी से फोड़े पर बँधी हुई मोटी सी पट्टी खोल देने के लिये निवेदन किया। गुरु जी उसका दृढ़ प्रेम देखकर और उसकी गद्गद् बाणी को सुनकर अति प्रसन्न हुये। तब उऩ्होंने कहा, ""बेटा! यदि हम पट्टी खोलते हैं, तो अति कष्ट होता है। अलबत्ता पट्टी में एक सिरे पर फोड़े का काला सा मुँह बाहर निकला हुआ है, तुम उसी से ही चूसना शुरु कर दो।''
     कल्याण ने आज्ञा सिरपर धारण कर ली और फोड़े के मुँह से अपना मुख लगा कर उसे चूसने लगा। जैसे ही उसने चूसना शुरु किया, उसे उसमें अत्यन्त मिठास मालूम हुई। अब वह जल्दी जल्दी मुख चलाने लगा। शेष सभी शिष्य-सेवक पास खड़े यह कौतुक देख रहे थे। कल्याण जल्दी करने लगा, दो गुरु जी ने उसे इस प्रकार टोका, मानों बहुत पीड़ा हो रही हो-""अरे बेटा! ज़रा धीरे धीरे चूसो, इस तरह तो तकलीफ बढ़ती है।'' मगर कल्याण को तो मिठास का आनन्द आ रहा था। थोड़ी ही देर में उसने फोड़े का सारा ज़हर चूस लिया। उसके बाद जब गुरु जी ने पट्टी अलग की, तो सब सेवक यह देखकर आश्चर्य में डूब गये कि वहाँ फोड़े की बजाये एक बड़े से तोता आम की गुठली निकली।
     असल में गुरु जी ने उन सबका मन जाँचने के लिये एक बड़े से मीठे आम को टाँग पर रखकर पट्टी पाँध ली थी। यह एक लीला मात्र थी। यह गुरुदेव का एक खेल था। कल्याण अपनी दृढ़ गुरु भक्ति के कारण इस खेल में बाज़ी मार ले गया। तथा दूसरे जो ह्मदय के कच्चे थे, प्राणों के भय से इस खेल में हार गये। कल्याण पर समर्थ स्वामी अति प्रसन्न हुये और उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे सबमें उत्तम पद प्रदान किया। जिससे वे बाद में कल्याण स्वामी के नाम से सुप्रसिद्ध हुये।

1 टिप्पणी:

  1. कठिन घडी में जो परीक्षा में पास होता है वही सच्चा इंसान या भक्त होता है
    बहुत अच्छी प्रेरक प्रस्तुति
    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं!

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